Tuesday, March 18, 2008

निशाने पर नजर

सफल मनुष्य वही कहलाता है, जिसका लक्ष्य एक हो और वह हमेशा उसकी पूर्ति में लगा रहे। एकाग्रता ऐसी शक्ति है, जो पत्थर को भी पिघला सकती है। कराटे सीखने वाला अपनी हथेली से ईट की दीवार इसी एकाग्र-शक्ति से तोड देता है। वह इस शक्ति के सहारे अपनी सारी ऊर्जा हाथ में केंद्रित कर लेता है और उसकी निगाह सिर्फ ईट के निशाने पर रहती है। इस तरह जीवन के हर क्षेत्र में हमें एकाग्र-शक्ति के इस्तेमाल की आवश्यकता पडती है। जब तक यह शक्ति नहीं जागती, हम कोई काम ठीक से और समय पर पूरा नहीं कर सकते। हम परीक्षा भवन में बैठकर प्रश्नपत्र हल कर रहे हों, कोई लेख लिख रहे हों या रसोई में खाना पका रहे हों, बिना एकाग्रता के कुछ भी ठीक से पूरा नहीं हो सकता। दाल में नमक ज्यादा डाल देंगे या उसकी जगह मिर्च या धनिया डाल देंगे। एकाग्रता भंग हुई और काम बिगडा। महान वैज्ञानिकों ने जितनी खोजें की हैं, जितने सिद्धांत बताए हैं-वे सब केवल एकाग्र-शक्ति के जागृत होने पर ही प्राप्त हुए हैं। एक विद्वान ने कहा, एकाग्रता एक ऐसी शक्ति है, जिसके आते ही सफलता निश्चित हो जाती है। कर्म, भक्ति, ज्ञान, योग और संपूर्ण साधना की सिद्धि का मूलमंत्र-एकाग्रता है। बडे-बडे ऋषि-मुनियों ने, साधकों और तपस्वियों ने इसी एकाग्रता के सहारे ईश्वर के दर्शन किए, अपने को अध्यात्म के शिखर पर पहुंचा दिया। किसी ने तो एकाग्रता शक्ति को साधना, अध्यात्म और चिंतन की चरमावस्था तक कह दिया है-तुम एकाग्रता द्वारा उस अनंत शक्ति के अटूट भंडार के साथ मिल जाते हो, जिससे इस ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई है। अंग्रेज विद्वान मार्ले कहते हैं, संसार के प्रत्येक कार्य में विजय पाने के लिए एकाग्रचित्त होना आवश्यक है। जो लोग चित्त को चारों ओर बिखेरकर काम करते हैं, उन्हें सैकडों वर्षो तक सफलता का मूल्य मालूम नहीं होता। इसलिए स्पष्ट है कि एकाग्रता ही वह शक्ति है, जो मनुष्य को सफलता दिलाती है। स्वामी विवेकानंद को अमेरिका में शून्य पर पंद्रह मिनट के लिए बोलने को कहा गया था। उन्होंने पूरी तरह एकाग्र होकर पंद्रह मिनट तक बोला। लेकिन उन्हें जब पंद्रह मिनट और दिए गए तब वह फिर एकाग्र होकर बोले। एकाग्र-शक्ति की मदद से। महान राजनीतिक विचारक डिजरायली तो यहां तक कह गए कि, मनुष्य को परिस्थितियों का दास नहीं होना चाहिए, बल्कि परिस्थितियों को अपने अधीन रखना चाहिए। डिजरायली का अपना जीवन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण था कि विदेश में जन्म लेकर भी वह इंग्लैंड के प्रधानमंत्री बनने में सफल हुए थे। द पावर ऑफ माइंड शीर्षक के तहत अपने भाषण में स्वामी विवेकानंद ने कहा था, यदि जीवन में अभीष्ट सफलता चाहते हो, तो एक आदर्श को लो, उसका चिंतन-मनन करो, उसी को अपने सपने में पा लो। अपने मस्तिष्क, मांसपेशियों, स्नायु तंत्र व समूचे अंग-प्रत्यंगों को इसी आदर्श के विचार से ओत-प्रोत कर दो और अन्य विचारों को एक तरफ हटा दो। फिर देखो, सफलता कैसे तुम्हारा कदम चूमती है। यदि तुम अपना जीवन सफल बनाना चाहते हो और समूची मानव जाति के लिए वरदान बनना चाहते हो, तो तुम्हें गहराई में जाना होगा। दृढ निश्चयी व्यक्ति को उसका लक्ष्य रूपी ध्रुवतारा बडी से बडी बाधाओं को पार करने की शक्ति देता है। परिस्थितियों के ज्वार-भाटों व आंधी-तूफानों के बीच भी वह हिम्मत नहीं हारता और निरंतर अपने ध्येय की ओर बढता ही रहता है। जिनका कोई उद्देश्य नहीं होता, उनका जीवन बिना पतवार की नौका जैसा होता है, जो इधर-उधर हिचकोले खाते भटकती रहती है। न उसे गंतव्य मिलता है, न किनारा। ऐसे व्यक्ति एक बिंदु पर ध्यान एकाग्र नहीं कर पाते। दरअसल, उनमें उद्देश्य के प्रति दृढता, साहस और चरित्र बल की कमी होती है। वे जीवन को जैसे-तैसे काटते रहते हैं। उद्देश्य के अभाव में न उन्हें दिशा बोध होता है, न कोई योजना होती है और वे परिस्थितियों के दास होते हैं। वे बिना रीढ के व्यक्ति होते हैं, जो अपनी शक्ति और क्षमताओं को संगठित करना नहीं जानते। लेकिन दृढ निश्चयी और उद्देश्यनिष्ठ व्यक्ति जीवन की विषम परिस्थितियों में भी अपना मार्ग खोज लेते हैं।

सफलता के सूत्र

आत्मविश्वास बढाने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि तुम वह कार्य करो, जिसे करते हुए तुम डरते हो। इस तरह ज्यों-ज्यों तुम्हें कामयाबी मिलती जाएगी, तुम्हारा आत्मविश्वास और बढता जाएगा। डेल कारनेगी

जो मनुष्य लोगों के व्यवहार से ऊब कर क्षण-प्रतिक्षण अपना मन बदलते रहते हैं, वे दुर्बल हैं, उनमें आत्मबल नहीं है।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस

गलती करना तो पाप है ही, पर उसे छिपाना उससे भी बडा पाप है।

महात्मा गांधी

ग्रंथ ऐसे अध्यापक हैं, जो बिना बेंत मारे, बिना कटु शब्द एवं क्रोध के, बिना वस्त्र और धन लिए हमें शिक्षा देते हैं।

रिचर्ड डी. बरी

यदि दुर्जन को अच्छी तरह शिक्षा दी जाए, तब भी वह साधु नहीं हो सकता। जैसे नीम के पेड को यदि घी और दूध से भी सींचा जाए, तो भी वह मधुर नहीं होता।

चाणक्य

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