Thursday, March 20, 2008


कैसे सेव करें मनी , अपने सारे खर्चो का एक रिकार्ड रखें। एक पेपर शीट को दो भागों में बांट लें। एक तरफ इनफ्लो और दूसरी तरफ आउटफ्लो या एक्सपेंस लिखें। इनफ्लो में प्राप्त हुए पैसे तारीख के साथ लिखें, साथ ही दूसरी ओर आउटफ्लो में खर्चे भी लिखते जाएं। जहां पर आपने बेवजह खर्च किया है, वहां एक क्रास का निशान डाल दें, ताकि भविष्य में ऐसे खर्चे से बचा जा सके। साथ ही यह ध्यान रखें कि कहीं आपके खर्चे आपकी पॉकेट मनी से ज्यादा तो नहीं हो रहे। पॉकेट मनी जिस समय तक के लिए मिली है, उसका ध्यान रखें। तब तक आपके पैसे चलने चाहिए। पॉकेट मनी मिलते ही, इसका कुछ हिस्सा अपने सेफ या पिग्गीबैक आदि में डाल दें। संभव हो तो कोई बचत खाता भी खुलवा सकते हैं, जिसमें आपको अपनी सेविंग्स पर कुछ इंटरेस्ट भी मिल सके। अपने फ्रेंड्स की या किसी और की देखा-देखी खरीदारी करने से बचें। पैसे की उपयोगिता समझें और याद रखें कि बूंद-बूंद से ही घड़ा भरता है। ये छोटी-छोटी सेविंग्स ही आपके बहुत काम आएगी।

पॉकेट मनी है न!


राहुल को उसके पापा हर हफ्ते पॉकेट मनी देते हैं। वह उन पैसों से अपनी पर्सनल जरूरतें पूरी करता है। कभी-कभी हफ्ते भर की पॉकेट मनी वह दो दिन में ही खत्म कर देता और फिर पापा से और अधिक पैसे की डिमांड करता। उसकी बढती जरूरतों को देखकर उसके पापा जब उससे पूछते कि तुम इन पैसों का करते क्या हो, तो वह जवाब देता कि इतने से तो रुपये बस ऐसे ही खत्म हो जाते हैं।

संभवत: राहुल की ही तरह आप लोग भी अपनी पॉकेट मनी के प्रति बडे कॉन्शियस रहते हो, और फिक्स्ड डेट पर तुरंत पापा से पॉकेट मनी लेने से चूकते नहीं हो।

लेकिन दोस्तो! पॉकेट मनी सिर्फ इसलिए नहीं होती कि आप लोग उसे धडल्ले से खर्च करें। दरअसल, पॉकेट मनी का जिक्र आते ही याद आता है पिग्गीबैंक। याद आ गई न गुल्लक की! जी हां, वही गुल्लक, जिसमें आप बचपन से रुपये जमा करते आए हैं।

आपमें से ज्यादातर लोग पॉकेट मनी मिलने से पहले ही अपने खर्चे की लिस्ट बना लेते हैं। कुछ हद तक आपका खर्च करना ठीक भी है, क्योंकि आपकी भी कुछ पर्सनल जरूरतें होती हैं। बडी फरमाइशें तो पैरेंट्स पूरी कर देते हैं, लेकिन बाकी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए पॉकेट मनी तो चाहिए ही न!

पॉकेट मनी के बारे में 13 साल का तन्मय कहता है कि उसे उसके पैरेंट्स हर सप्ताह 100 रुपये देते हैं, इस पॉकेट मनी को या तो वह जंक फूड खाने में खर्च करता है या फिर कम्प्यूटर गेम्स की नई-नई सीडी लाने में। वहीं उसकी छोटी बहन सान्या, जो पांचवीं क्लास की स्टूडेंट है, को 50 रुपये प्रति सप्ताह पॉकेट मनी मिलती है, जिसे वह पेन, पेंसिल खरीदने में ही खर्च करना पसंद करती है।

पॉकेट मनी सेविंग के बारे में जब हमने 12 वर्षीय शशांक से बात की, तो उसने हमें एक वाक्या सुनाया। उसने बताया कि उसे हर सप्ताह 50-60 रुपये पॉकेट मनी के रूप में मिलते हैं। उन पैसों से या तो पह कॉमिक्स खरीदता या फिर स्पाइडरमैन, पोकमैन इत्यादि के स्टीकर्स। एक बार खेल के दौरान उससे उसके फ्रेंड का रैकेट टूट गया। वह उसे रैकेट के पैसे देना तो चाहता था, पर उसके पास कुछ भी सेविंग नहीं थी, पैरेंट्स से पैसे लेता, तो शायद डांट भी पडती। इसलिए उसने कुछ महीनों तक अपनी पॉकेट मनी का कुछ पार्ट सेव किया और फिर एक दिन अपने पिग्गीबैंक में से पैसे निकालकर अपने फ्रेंड को एक नया रैकेट गिफ्ट किया। अगर पॉकेट मनी को मंथली रूप में देखें, तो अमूमन यह करीब 200 से 400 रुपये होती है, मतलब सात रुपये से तेरह रुपये प्रति दिन आपको मिलते हैं। इसलिए अपने रोजाना के खर्चे को इसी लिमिट में सीमित करने की कोशिश करें। जाहिर है इन्हीं की तरह आपके और आपके फ्रेंड्स भी अपनी पॉकेट मनी अपनी च्वॉइस और इंट्रेस्ट के अनुसार अलग-अलग चीजों पर खर्च करते होंगे। मेट्रो सिटीज में तो कुछ टीनएजर्स की पॉकेट मनी महीने में हजार-दो हजार रुपये तक होती है।

हर किसी के अलग-अलग खर्चे होते हैं, और इसीलिए सभी की पॉकेट मनी में वैरिएशंस होते हैं, लेकिन एक ऐसी चीज भी है, जो आप सभी की पॉकेटमनी में कॉमन होनी चाहिए, और वह है सेविंग।

अब शायद आपको लगे कि हमें सेविंग करने की क्या जरूरत है, क्योंकि जब भी हमें रुपयों की जरूरत होगी, तो हम पैरेंट्स से मांग ही लेंगे। लेकिन दोस्तो, याद रखिए कि पॉकेट मनी में से की गई सेविंग न केवल जरूरत के वक्त आपके काम आएगी, बल्कि कभी-कभी आप लोग इस सेविंग्स से दूसरों की मदद भी कर सकेंगे। शायद आप लोगों को पता नहीं होगा कि पिछले वर्ष उडीसा में आप जैसे कुछ स्टूडेंट्स ने चार साल तक अपनी पॉकेट मनी का कुछ हिस्सा जोडकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के एक स्टैच्यू का निर्माण कराया। अपनी इन छोटी-छोटी सेविंग के जरिए आप किसी अवसर पर अपने पैरेंट्स के लिए गिफ्ट भी खरीद सकते हो।

अब आप लोगों को लग रहा होगा कि पॉकेट मनी सेविंग कितनी जरूरी है और इससे आप क्या-क्या कर सकते हैं और अगर लग रहा है कि सेविंग जरूरी है, तो अभी से डेवलॅप कीजिए पॉकेट मनी को सेव करनी की हैबिट, ताकि जब कभी आपको रुपयों की अचानक जरूरत पडे, तो आप निश्चिंत होकर कह सकें कि डॅन्ट वरी, पिग्गीबैंक है

Tuesday, March 18, 2008

PRIYA

RAJVIR YADAV

निशाने पर नजर

सफल मनुष्य वही कहलाता है, जिसका लक्ष्य एक हो और वह हमेशा उसकी पूर्ति में लगा रहे। एकाग्रता ऐसी शक्ति है, जो पत्थर को भी पिघला सकती है। कराटे सीखने वाला अपनी हथेली से ईट की दीवार इसी एकाग्र-शक्ति से तोड देता है। वह इस शक्ति के सहारे अपनी सारी ऊर्जा हाथ में केंद्रित कर लेता है और उसकी निगाह सिर्फ ईट के निशाने पर रहती है। इस तरह जीवन के हर क्षेत्र में हमें एकाग्र-शक्ति के इस्तेमाल की आवश्यकता पडती है। जब तक यह शक्ति नहीं जागती, हम कोई काम ठीक से और समय पर पूरा नहीं कर सकते। हम परीक्षा भवन में बैठकर प्रश्नपत्र हल कर रहे हों, कोई लेख लिख रहे हों या रसोई में खाना पका रहे हों, बिना एकाग्रता के कुछ भी ठीक से पूरा नहीं हो सकता। दाल में नमक ज्यादा डाल देंगे या उसकी जगह मिर्च या धनिया डाल देंगे। एकाग्रता भंग हुई और काम बिगडा। महान वैज्ञानिकों ने जितनी खोजें की हैं, जितने सिद्धांत बताए हैं-वे सब केवल एकाग्र-शक्ति के जागृत होने पर ही प्राप्त हुए हैं। एक विद्वान ने कहा, एकाग्रता एक ऐसी शक्ति है, जिसके आते ही सफलता निश्चित हो जाती है। कर्म, भक्ति, ज्ञान, योग और संपूर्ण साधना की सिद्धि का मूलमंत्र-एकाग्रता है। बडे-बडे ऋषि-मुनियों ने, साधकों और तपस्वियों ने इसी एकाग्रता के सहारे ईश्वर के दर्शन किए, अपने को अध्यात्म के शिखर पर पहुंचा दिया। किसी ने तो एकाग्रता शक्ति को साधना, अध्यात्म और चिंतन की चरमावस्था तक कह दिया है-तुम एकाग्रता द्वारा उस अनंत शक्ति के अटूट भंडार के साथ मिल जाते हो, जिससे इस ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई है। अंग्रेज विद्वान मार्ले कहते हैं, संसार के प्रत्येक कार्य में विजय पाने के लिए एकाग्रचित्त होना आवश्यक है। जो लोग चित्त को चारों ओर बिखेरकर काम करते हैं, उन्हें सैकडों वर्षो तक सफलता का मूल्य मालूम नहीं होता। इसलिए स्पष्ट है कि एकाग्रता ही वह शक्ति है, जो मनुष्य को सफलता दिलाती है। स्वामी विवेकानंद को अमेरिका में शून्य पर पंद्रह मिनट के लिए बोलने को कहा गया था। उन्होंने पूरी तरह एकाग्र होकर पंद्रह मिनट तक बोला। लेकिन उन्हें जब पंद्रह मिनट और दिए गए तब वह फिर एकाग्र होकर बोले। एकाग्र-शक्ति की मदद से। महान राजनीतिक विचारक डिजरायली तो यहां तक कह गए कि, मनुष्य को परिस्थितियों का दास नहीं होना चाहिए, बल्कि परिस्थितियों को अपने अधीन रखना चाहिए। डिजरायली का अपना जीवन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण था कि विदेश में जन्म लेकर भी वह इंग्लैंड के प्रधानमंत्री बनने में सफल हुए थे। द पावर ऑफ माइंड शीर्षक के तहत अपने भाषण में स्वामी विवेकानंद ने कहा था, यदि जीवन में अभीष्ट सफलता चाहते हो, तो एक आदर्श को लो, उसका चिंतन-मनन करो, उसी को अपने सपने में पा लो। अपने मस्तिष्क, मांसपेशियों, स्नायु तंत्र व समूचे अंग-प्रत्यंगों को इसी आदर्श के विचार से ओत-प्रोत कर दो और अन्य विचारों को एक तरफ हटा दो। फिर देखो, सफलता कैसे तुम्हारा कदम चूमती है। यदि तुम अपना जीवन सफल बनाना चाहते हो और समूची मानव जाति के लिए वरदान बनना चाहते हो, तो तुम्हें गहराई में जाना होगा। दृढ निश्चयी व्यक्ति को उसका लक्ष्य रूपी ध्रुवतारा बडी से बडी बाधाओं को पार करने की शक्ति देता है। परिस्थितियों के ज्वार-भाटों व आंधी-तूफानों के बीच भी वह हिम्मत नहीं हारता और निरंतर अपने ध्येय की ओर बढता ही रहता है। जिनका कोई उद्देश्य नहीं होता, उनका जीवन बिना पतवार की नौका जैसा होता है, जो इधर-उधर हिचकोले खाते भटकती रहती है। न उसे गंतव्य मिलता है, न किनारा। ऐसे व्यक्ति एक बिंदु पर ध्यान एकाग्र नहीं कर पाते। दरअसल, उनमें उद्देश्य के प्रति दृढता, साहस और चरित्र बल की कमी होती है। वे जीवन को जैसे-तैसे काटते रहते हैं। उद्देश्य के अभाव में न उन्हें दिशा बोध होता है, न कोई योजना होती है और वे परिस्थितियों के दास होते हैं। वे बिना रीढ के व्यक्ति होते हैं, जो अपनी शक्ति और क्षमताओं को संगठित करना नहीं जानते। लेकिन दृढ निश्चयी और उद्देश्यनिष्ठ व्यक्ति जीवन की विषम परिस्थितियों में भी अपना मार्ग खोज लेते हैं।

सफलता के सूत्र

आत्मविश्वास बढाने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि तुम वह कार्य करो, जिसे करते हुए तुम डरते हो। इस तरह ज्यों-ज्यों तुम्हें कामयाबी मिलती जाएगी, तुम्हारा आत्मविश्वास और बढता जाएगा। डेल कारनेगी

जो मनुष्य लोगों के व्यवहार से ऊब कर क्षण-प्रतिक्षण अपना मन बदलते रहते हैं, वे दुर्बल हैं, उनमें आत्मबल नहीं है।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस

गलती करना तो पाप है ही, पर उसे छिपाना उससे भी बडा पाप है।

महात्मा गांधी

ग्रंथ ऐसे अध्यापक हैं, जो बिना बेंत मारे, बिना कटु शब्द एवं क्रोध के, बिना वस्त्र और धन लिए हमें शिक्षा देते हैं।

रिचर्ड डी. बरी

यदि दुर्जन को अच्छी तरह शिक्षा दी जाए, तब भी वह साधु नहीं हो सकता। जैसे नीम के पेड को यदि घी और दूध से भी सींचा जाए, तो भी वह मधुर नहीं होता।

चाणक्य

जी.के. अपटेड

1. भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) द्वारा स्थापित इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) की कोलकाता फ्रेंचाइजी खरीदने वाले बॉलिवुड सुपर स्टार शाहरुख खान ने अपनी टीम को क्या नाम दिया है?

(क) बंगाल टाइगर्स (ख) कलकत्ता टाइगर्स

(ग) नाइट राइडर्स (घ) बंगाल राइडर्स

2. विश्व की किस प्रमुख कम्प्यूटर कंपनी और सर्च इंजन ने अपना हेडक्वार्टर लंदन से जिनेवा (स्विट्जरलैंड) शिफ्ट करने का निर्णय लिया है?

(क) गूगल (ख) माइक्रोसॉफ्ट

(ग) एमएसएन (घ) याहू

3. चीन की सत्तारुढ पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीपीसी) के प्रमुख, जिन्हें 15 मार्च, 2008 को फिर से अगले पांच साल के लिए देश का राष्ट्रपति चुन लिया गया?

(क) शी चिनफिंग (ख) चीन थाओ

(ग) चिन हुआ (घ) थाओ हुआंग

4. दुनिया की छत्त के नाम से प्रसिद्ध तिब्बत पर चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने कब कब्जा किया था?

(क) 1951 में (ख) 1961 में

(ग) 2001 में (घ) 1956 में

5. तिब्बत की राजधानी का नाम है?

(क) धर्मशाला (ख) ल्हासा

(ग) तिब्बत (घ) पामीर

6. हाल ही में जारी ईएसपीएन-स्टार स्पो‌र्ट्स की मारुति-सुजुकी वन डे क्रिकेट रैंकिंग के अनुसार दुनिया के नंबर एक बल्लेबाज का नाम है?

(क) चंद्रपाल (वे.इंडीज) (ख) सचिन तेंदुलकर

(ग) मु. यूसुफ (पाक) (घ) मैकुलम (न्यूजीलैंड)

7. एलजी आईसीसी वन डे रैंकिंग में भारत किस स्थान पर है?

(क) दूसरे (ख) तीसरे

(ग) चौथे (घ) पांचवें

8. भारतीय मूल की 10वीं में पढने वाली किस अमेरिकी छात्रा ने कैंसर पर किए गए प्रोजेक्ट के लिए अमेरिका के प्रतिष्ठित इंटल विज्ञान प्रतिभा खोज प्रतियोगिता का पुरस्कार (जूनियर नोबेल के नाम से प्रसिद्ध) जीत लिया है?

(क) अनिता अरोडा (ख) ममता

(ग) शिवानी सूद (घ) कमला

9. अमेरिका के वुडरो विल्सन इंटरनेशनल सेंटर फॉर स्कॉलर्स की ओर से वुडरो विल्सन पुरस्कार से किसे सम्मानित किया गया है?

(क) सोनिया गांधी (ख) एपीजे अब्दुल कलाम

(ग) नारायण मूर्ति (घ) ख व ग दोनों को

10.बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप द्वारा जारी ताजा रिपोर्ट में दुनिया की 50 देसी किंग कंपनियों में कितनी भारतीय कंपनियों को शामिल किया गया है ?

(क) 10 (ख) 11

(ग) 12 (घ) 13

उत्तर : 1. (ग) 2. (घ) 3. (ख) 4. (क) 5. (ख) 6. (ख) 7. (ग) 8. (ग) 9. (घ) 10. (ख)

कम खर्च में विदेश में पढ़ाई

ऑस्ट्रेलिया अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में ही चैंपियन नहीं है, बल्कि इसे अब्रॉड एजुकेशन के लिए भी जाना जाता है। खास बात यह है कि यूएस और यूके के बाद ऑस्ट्रेलिया एक ऐसा देश है, जिसे भारतीय छात्र कई कारणों से पसंद करते हैं। इनमें दो कारण मुख्य हैं-पहला, ऑस्ट्रेलिया की कुछ यूनिवर्सिटी की व‌र्ल्ड-रैंकिंग यूके एवं यूएस यूनिवर्सिटीज की तरह ही काफी अच्छी है। दूसरा, ऑस्ट्रेलिया की किसी भी यूनिवर्सिटी में पढना यूके और यूएस की अपेक्षा कम खर्चीला होता है। यही वजह है कि वहां की यूनिवर्सिटीज में भारतीय स्टूडेंट्स की संख्या काफी है। एजुकेशन के दौरान ऑस्ट्रेलिया में पार्ट टाइम जॉब करने की भी अनुमति है। इस कारण भी भारतीय स्टूडेंट्स अब्रॉड एजुकेशन के लिए वहां जाना पसंद करते हैं। बहरहाल, आईटी, इंजीनियरिंग, बिजनेस स्टडी आदि कुछ ऐसे प्रमुख क्षेत्र हैं, जिनकी उच्चस्तरीय फैकल्टी और सुविधाओं के कारण ऑस्ट्रेलिया इस मामले में काफी लोकप्रिय होता जा रहा है।

पॉपुलर कोर्स

ऑस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालयों में आईटी, बिजनेस एवं इंजीनियरिंग से संबंधित कोर्सो के अलावा आ‌र्ट्स एवं एग्रीकल्चरल साइंस के विषय भी काफी लोकप्रिय हैं। जो स्टूडेंट्स कला और रचनात्मक क्षेत्रों से संबंधित विषयों में ऑस्ट्रेलिया की किसी भी यूनिवर्सिटी में प्रवेश लेना चाहते हैं, वे निम्नलिखित विषयों में से किसी एक को चुन सकते हैं :

फैशन डिजाइनिंग

इंटीरियर डेकोरेशन

ज्यूलॅरी डिजाइनिंग

ग्राफिक डिजाइनिंग

फिल्म मेकिंग आदि

कोर्स अवधि

अगर आप ऑस्ट्रेलिया की किसी भी यूनिवर्सिटी से मास्टर कोर्स करना चाहते हैं, तो एक से दो वर्ष की अवधि में पूरा कर सकते हैं। उल्लेखनीय है कि यहां के कुछ मास्टर कोर्स एक वर्ष की अवधि में, तो कुछ ऐसे भी कोर्स हैं, जिन्हें दो वर्ष की अवधि में पूरा कर सकते हैं। वहीं, रिसर्च स्टडी के लिए कुल तीन वर्ष की अवधि निर्धारित की गई है।

योग्यता

मास्टर कोर्स में आवेदन करने के लिए स्टूडेंट का स्नातक होना जरूरी है, जबकि रिसर्च स्टडी के लिए भी स्नातकोत्तर होना आवश्यक है। हालांकि रिसर्च के लिए आवेदन करने वाले जो अभ्यर्थी किसी प्रकार की अतिरिक्त योग्यता और अपने फील्ड में कार्यानुभव रखते हैं, उन्हें दाखिले में वरीयता दी जाती है। इसके अलावा, अंग्रेजी का उच्चस्तरीय ज्ञान और आईईएलटीएस (इंटरनेशनल इंग्लिश लैंग्वेज टेस्टिंग सिस्टम) में बेहतर अंक पाना जरूरी है।

प्रवेश प्रक्रिया

चूंकि ऑस्ट्रेलिया और भारत दोनों का एजुकेशन सिस्टम लगभग एक जैसा ही है, इसलिए ऑस्ट्रेलिया में दाखिले के लिए किसी विशेष प्रवेश परीक्षा का प्रावधान नहीं है। हां, वीजा पाने के लिए और वहां के किसी भी यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने के लिए कुछ शर्ते जरूर पूरी करनी होती हैं। जहां तक आवेदन प्रक्रिया की बात है, तो आम तौर पर यहां आप संबंधित यूनिवर्सिटी के वेबसाइट पर जाकर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। साथ ही, इन्हीं वेबसाइट्स से आवेदन संबंधी जरूरी जानकारी भी प्राप्त कर सकते हैं।

जरूरी दस्तावेज

अपने आवेदन पत्र के साथ आपको निम्नलिखित दस्तावेज संलग्न करने होंगे :

शैक्षिक प्रमाण पत्रों की प्रतियां

रेज्यूमे द्य अनुशंसा पत्र

आईईएलटीएस अंक पत्र आदि।

कहां करें संपर्क?

ऑस्ट्रेलिया के किसी भी विश्वविद्यालय में प्रवेश प्रक्रिया की जानकारी और वीजा संबंधी तमाम सूचनाओं को आप भारत स्थित ऑस्ट्रेलियाई दूतावास से प्राप्त कर सकते हैं। ऑस्ट्रेलियाई दूतावास (दिल्ली) का पता है 1/50-जी, शांतिपथ, चाणक्यपुरी, पोस्ट बॉक्स-5210, नई दिल्ली-110 021, ई-मेल : austhighcom.newdelhi@d fat.gov.au

ऑस्ट्रेलिया में उच्च शिक्षा हासिल करना यूएस और यूके से कम खर्चीला है।

भारत की तरह एजुकेशन सिस्टम होने के कारण वहां किसी खास प्रवेश परीक्षा की जरूरत नहीं होती।

हां, अंग्रेजी के ज्ञान की जांच के लिए आईईएलटीएस स्कोर कार्ड जरूर मांगा जाता है।

आईटी, इंजीनियरिंग, बिजनेस स्टडी आदि ऑस्ट्रेलिया के पॉपुलर कोर्स हैं।

ऑस्ट्रेलिया की प्रमुख यूनिवर्सिटीज

यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी, सिडनी www.uts.edu.au

यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स www.unsw.edu.au

रोयाल मेलबोर्न इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी (आरएमआईटी) www.rmit.edu.au

ला ट्रॉब यूनिवर्सिटी www.latrobe.edu.au

जेम्स कुक यूनिवर्सिटी www.jcu.edu.au

ग्रिफ्थ यूनिवर्सिटी www.griffith.edu.au

यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी www.usyd.edu.au

सीमा झा

दिमाग रखें कूल-कूल

डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा की क्लास

किसी भी परीक्षा में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के लिए जरूरी है कि परीक्षार्थी एग्जामिनेशन हाल में अपना दिमाग ठंडा रखते हुए प्रश्नों के जवाब दें। चूंकि आपने पूरे साल पढाई की है और कोर्स पर मजबूत पकड बनाई है, इसलिए प्रश्नपत्र देखकर घबराने की कोई जरूरत नहीं है। सबसे पहले प्रश्नों को अच्छी तरह से समझें और फिर उत्तर दें। परीक्षा में हर विषय और हर स्टूडेंट की अपनी स्ट्रेटेजी होती है। उनका प्रदर्शन कैसे और बेहतर हो, इसके लिए विभिन्न विषयों पर हमारे एक्सपर्ट एग्जाम एडवाइज देते रहे हैं। इस बार का एडवाइज है-बीएससी (ऑनर्स) केमिस्ट्री पर

बीएससी (ऑनर्स) केमिस्ट्री के फ‌र्स्ट ईयर के स्टूडेंट्स सबसे ज्यादा डरे रहते हैं, क्योंकि उनके दिमाग में बारहवीं कक्षा से ही यह बात बैठी रहती है कि केमिस्ट्री बहुत मुश्किल सब्जेक्ट है। लेकिन यदि पूरे साल आपने लगन से थ्योरी और प्रैक्टिकल्स किए हैं, तो इस स्टेज तक आप खुद को सहज महसूस कर रहे होंगे। बावजूद इसके यदि आपकी तैयारी में कुछ कसर बाकी है, तो उसे सिलेक्टिव स्टडी करके पूरा किया जा सकता है। चूंकि वार्षिक परीक्षाओं में अब बहुत कम समय बचा है, इसलिए अब ज्यादा से ज्यादा किताबें पढने में वक्त बर्बाद न करें। बेहतर यह होगा कि सबसे पहले आप अपने क्लास नोट्स का रिवीजन शुरू करें। रिवीजन के दौरान किसी टॉपिक पर कठिनाई आने पर कुछ सिलेक्टेड किताबों से मैटीरियल ले सकते हैं। इन दिनों आपके लिए जो किताबें उपयोगी हो सकती हैं, उनके नाम हैं :

कन्साइज इनऑर्गेनिक केमिस्ट्री-ली

ऑर्गेनिक केमिस्ट्री-मॉरिसन ऐंड बॉयड

फिजिकल केमिस्ट्री-कैस्टलन

हौव्वा न समझें ऑर्गेनिक केमिस्ट्री को केमिस्ट्री के पेपर में स्टूडेंट्स को सबसे ज्यादा डर ऑर्गेनिक केमिस्ट्री के पेपर से लगता है। पर इसको अच्छी तरह समझने के लिए इन बातों पर गौर करें :

ऑर्गेनिक कम्पाउंड को समझें।

नॉमेन क्लेचर पर विशेष ध्यान दें। नॉमन क्लेचर ऑर्गेनिक कम्पाउंड्स के नामों को निकालने की ही विधि है।

इस पेपर के लिए रोजाना करीब दो घंटे की प्रैक्टिस जरूरी है।

फिजिकल केमिस्ट्री से न घबराएं

ऑर्गेनिक केमिस्ट्री के बाद फिजिकल केमिस्ट्री ही वह पेपर है, जिसका भूत परीक्षार्थियों को डराता है। यदि आप गणित के मूलभूत सिद्धांतों को समझते हुए न्यूमेरिकल्स को सॉल्व करने की प्रैक्टिस करें, तो आपके लिए यह पेपर बेहद स्कोरिंग बन जाएगा। इसकी तैयारी के लिए कुछ बातों पर ध्यान दें:

मैथ्स के सिद्धांतों, जिनका प्रयोग केमिस्ट्री के न्यूमेरिकल्स सॉल्व करने में होता है, उसको एक बार जरूर रिवाइज कर लें।

न्यूमेरिकल्स सॉल्व करते समय स्टेप्स का पूरा ध्यान रखें, क्योंकि स्टेप्स मिस करने पर भी नंबर काट लिए जाते हैं।

सेल्फ स्टडी करें

परीक्षाएं सिर पर होने की वजह से अब आपके पास तैयारी के लिए ज्यादा वक्त नहीं है, इसलिए टाइम बर्बाद न करें। आपकी डेट-शीट के मुताबिक जितने भी दिन एग्जाम के लिए बचे हैं, उन्हें हर पेपर की तैयारी के लिए बराबर बांटकर स्टडी करें। ग्रुप स्टडी की बजाय घर बैठकर तैयारी करें, तो ज्यादा अच्छा होगा। अपनी तैयारी के आकलन के लिए हर रोज पिछले कुछ सालों के प्रश्नपत्रों को हल करने का अभ्यास करें। इससे यह पता चल जाएगा कि आप किस तरह के सवालों को हल करने में ज्यादा समय लेते हैं और किसमें कम।

प्रैक्टिकल पेपर्स

केमिस्ट्री में थ्योरी पेपर्स के साथ-साथ प्रैक्टिकल परीक्षाओं की भी बराबर अहमियत है। आमतौर पर थ्योरी से पहले प्रैक्टिकल होते हैं, इसलिए इनसे संबंधित खास बातों पर जरूर ध्यान देना चाहिए :

जिस टॉपिक पर आपको प्रैक्टिकल करने के लिए दिया जाए, उसके ऑब्जर्वेशन साफ-साफ रिकॉर्ड करें।

प्रैक्टिकल के रिजल्ट को लिखते समय सावधानी बरतें। याद रखें कि ओवरराइटिंग से अंक कटते हैं।

श्च जो ग्राफ चार्ट आप बना रहे हैं, उसे दिए गए दिशा-निर्देशों के अनुसार ही बनाएं। यदि निर्देश स्पष्ट न हों, तो ग्राफ का प्लॉट साइज बडा रखें, जिससे कि उसके महत्वपूर्ण हिस्सों को आसानी से दर्शा सकें।

प्रैक्टिकल के रिजल्ट को अंडर लाइन करें, जिससे परीक्षक आपके प्रयोग के परिणाम से आसानी से परिचित हो जाए।

प्रैक्टिकल पेपर्स में पूरे अंक मिलने की संभावना थ्योरी पेपर्स से कहीं ज्यादा होती है, इसलिए इन्हें सीरियसली लें।

लास्ट मिनट स्टडी से बचें

अक्सर परीक्षार्थी परीक्षा हॉल में जाते समय लास्ट मिनट तक पढते रहते हैं। ऐसा करना ठीक नहीं होता। लास्ट मिनट स्टडी से किसी टॉपिक को लेकर कन्फ्यूज्ड भी हो सकते हैं, इसलिए साल भर की तैयारी पर भरोसा रखें और परीक्षा शुरू होने से ठीक पहले कूल रहें।

एग्जामिनेशन हॉल में रखें सावधानी

एग्जामिनेशन हॉल में कूल रहकर आप प्रश्नों के जवाब बहुत अच्छी तरह से लिख सकते हैं। इसके लिए निम्नलिखित टिप्स को ध्यान में रखें :

पेपर मिलने के बाद फटाफट लिखना न शुरू कर दें।

पहले प्रश्नों को अच्छी तरह समझें, फिर आंसर शीट पर प्रश्न का सीरियल नंबर लिखकर आंसर लिखना शुरू करें।

आंसर का इंट्रोडक्शन ठीक से लिखें, लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि कहीं इंट्रो लिखने में ही ज्यादा टाइम न लगा दें।

आंसर शीट के जिस पेज पर एक आंसर पूरा हो, वहीं से दूसरा आंसर शुरू न करें। इसे अगले पृष्ठ से प्रारंभ करें।

अक्सर परीक्षार्थी यह सोचते हैं कि ज्यादा पेज भरने से अधिक अंक मिलते हैं। ऐसा नहीं होता। इसलिए पूछे गए सवाल के मुताबिक ही सारगर्भित उत्तर दें। फालतू बातें लिखकर एग्जामिनर को भटकाने की कोशिश न करें।

आंसर पूरा करने के बाद महत्वपूर्ण हिस्सों को अंडरलाइन जरूर करें।

सफलता के 5 टिप्स

अपने क्लास नोट्स और असाइनमेंट्स को तैयारी का मुख्य आधार बनाएं। जरूरत पडने पर कुछ इम्पॉर्टेट चैप्टर्स को सीधे किताबों से पढें।

इन दिनों 40 प्रतिशत टाइम पढने और 60 प्रतिशत समय सवालों के आंसर लिखने में लगाएं।

दूसरों की देखा-देखी न करें। जिस समय भी आप पढने में खुद को सहज महसूस करें, उसी समय पढना शुरू कर दें।

परीक्षा को लेकर थोडी एंग्जायटी स्वाभाविक है, इसे पॉजिटिव रूप में लें।

उन पेपर्स की तैयारी में टाइम ज्यादा दें, जिनमें आपको कठिनाई आती है।

आसान बनाएं महंगी पढ़ाई

कार्तिकेय वर्मा मिर्जापुर स्थित एक कालीन फैक्ट्री में मध्यम दर्जे के ओहदे पर कार्यरत हैं। उनके दो बेटियां और दो बेटे हैं। उनके सभी बच्चे प्रतिभाशाली हैं। उनका बडा बेटा नितिन इस वर्ष बारहवीं बोर्ड (पीसीबी) की परीक्षा में शामिल हुआ है। नितिन सीपीएमटी की परीक्षा में भी बैठ रहा है और उसे उम्मीद है कि मेरिट में ऊंचा स्थान हासिल कर उसे देश के किसी नामी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिल जाएगा। पर कार्तिकेय वर्मा मेडिकल (एमबीबीएस) में प्रवेश और कुल साढे पांच साल की पढाई पर आने वाले करीब पांच लाख रुपये से अधिक के खर्चे को लेकर चिंतित हैं। जब उन्होंने अपनी इस चिंता से अपने सहकर्मी और दोस्त राजीव को अवगत कराया, तो उसने नितिन के अच्छे करियर के लिए एजुकेशन लोन लेने का रास्ता सुझाया। कार्तिकेय को भी यह बात जंच गई, लेकिन यह क्या! जब उन्होंने कुछ बैंकों से फोन पर बात की, तो उन्हें इस बारे में कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। दोस्त की सलाह पर वे शहर के एक बडे सरकारी बैंक के बडे अधिकारी से मिले और अपनी समस्या बताई। उस अधिकारी ने न केवल उनकी बात गौर से सुनी, बल्कि उनका उत्साहवर्द्धन करते हुए उनके बेटे का लोन पास कराने में हर संभव सहयोग करने का आश्वासन दिया। एक दूसरा केस जमशेदपुर के दिनेश ठाकुर ने अच्छे अंकों से ग्रेजुएशन कर कैट की परीक्षा दी है और आईआईएम से मैनेजमेंट करना चाहता है, पर उसके परिवार की स्थिति ऐसी नहीं है कि उसकी महंगी पढाई का भार वहन कर सके। ऐसे में दिनेश को एजुकेशन लोन का विकल्प दिखा, जिसकी मदद से वह मनचाही पढाई कर सकता था और उसके परिवार पर इसका बोझ भी नहीं पडता। लेकिन जब लोन के लिए उसे एक बैंक से दूसरे बैंक भटकना पडा, तो वह हताश होने लगा। अंतत: उसे भी एक सरकारी बैंक के सीनियर ऑफिसर से मिलने के बाद ही लोन अप्रूव कराने में कामयाबी मिली।

दरअसल, एजुकेशन लोन देने का दावा तो प्राय: सभी राष्ट्रीयकृत और निजी बैंक करते हैं और उनके विज्ञापनों में ऐसा दिखता भी है, लेकिन वास्तविक स्थिति यही है कि बैंक एजुकेशन लोन लेने वालों के साथ पूरा सहयोग नहीं करते। इससे एजुकेशन लोन का मकसद ही निरर्थक लगने लगता है और इस मद का अधिकांश पैसा खर्च ही नहीं हो पाता। हालांकि, इसके लिए हाल ही में वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने बैंकों को निर्देश जारी किए हैं कि वे एजुकेशन लोन को बढावा देने के लिए हर संभव कोशिश करें।

किसे चाहिए एजुकेशन लोन

मैनेजमेंट, इंजीनियरिंग, मेडिकल, इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी जैसे बेहतर करियर वाले कोर्स हर प्रतिभाशाली युवा करना चाहता है, लेकिन इन कोर्सो को करने में आने वाला पांच से दस लाख रुपये का खर्च उन्हें और उनके माता-पिता को हताश करता रहा है। भारत में साधारण विश्वविद्यालयी शिक्षा तो सस्ती है, जिसके लिए मिडिल और लोअर क्लास से संबंधित लोगों को कोई परेशानी नहीं होती, लेकिन प्रोफेशनल शिक्षा इतनी महंगी है कि वे चाहकर भी साहस नहीं जुटा पाते। पर उनकी यह मुश्किल आसान बनाता है विभिन्न बैंकों द्वारा दिया जाने वाला एजुकेशन लोन। वैसे तो अधिकांश बैंक यह लोन उपलब्ध कराते हैं, लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक इस मामले में कहीं अधिक उदार है। इसका सबसे बडा कारण सरकार द्वारा एजुकेशन लोन को बढावा दिया जाना है। ऐसे लोन पर पेरेन्ट्स या गार्जियन को इनकम टैक्स ऐक्ट के सेक्शन 80-ई के तहत कर छूट का लाभ भी मिलता है। लेकिन स्टूडेंट्स और उनके माता-पिता एजुकेशन लोन लेने से पहले उसके सभी पक्षों, जैसे-रीपेमॅन्ट विकल्प, इंट्रेस्ट रेट, प्रॉसेसिंग फी, पेमॅन्ट फी आदि के बारे में पूरी जानकारी हासिल कर लें।

कितनी है सीमा?

एजुकेशन लोन के रूप में मिलने वाली धनराशि कोर्स या विषय की जरूरत के अनुसार तय की जाती है। वैसे, भारत में अधिकांश बैंक एजुकेशन लोन के रूप में अधिकतम पंद्रह लाख रुपये तक का लोन उपलब्ध कराते हैं। भारत में पढने के लिए अधिकतम साढे सात लाख और विदेश में पढने के लिए अधिकतम 15 लाख रुपये मिल सकते हैं। हालांकि, कुछ बैंक बीस लाख रुपये और एचएसबीसी जैसे कुछ बैंक पच्चीस लाख रुपये तक एजुकेशन लोन के रूप में देते हैं। सरकारी नियमों के मुताबिक चार लाख रुपये तक के लोन पर कोई ब्याज नहीं देना पडता, जबकि इससे ऊपर के लोन पर साधारण दर से ब्याज देना पडता है। सामान्यतया भारत में पढाई के लिए गए लोन पर पांच प्रतिशत और विदेश में पढाई के लिए गए लोन पर बारह से पंद्रह प्रतिशत का ब्याज लगता है।

क्या-क्या होता है शामिल?

आमतौर पर किसी भी बैंक द्वारा एजुकेशन लोन किसी कोर्स पर होने वाले खर्च के लिए दिया जाता है। इसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित खर्च शामिल होते हैं :

संस्थान की फीस, हॉस्टल और भोजन पर होने वाला खर्च एग्जामिनेशन, लाइब्रेरी और लेबोरेटरी फीस पुस्तकों, वस्त्र और उपकरणों पर खर्च कॉशन मनी, बिल्डिंग फंड आवागमन का खर्च (खासकर विदेश में पढाई के लिए)

बैंक स्टूडेंट की आवश्यकता के अनुसार लैपटॉप, कम्प्यूटर या अन्य खर्चो के लिए भी धन दे सकते हैं। भारतीय स्टेट बैंक एजुकेशनल लोन के तहत टू-व्हीलर के लिए भी पैसा मुहैया कराता है। बैंक अमूमन संबंधित कोर्स पर होने वाले कुल खर्च का अस्सी से नब्बे फीसदी मुहैया कराते हैं।

कौन होता है योग्य? जिस किसी स्टूडेंट के लिए एजुकेशन लोन लेना हो, उसकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि बहुत अच्छी होनी चाहिए। इसके अलावा देश या विदेश के किसी प्रतिष्ठित संस्थान में एडमिशन लिया होना या इसकी स्वीकृति प्राप्त होना आवश्यक है। उसे भारतीय नागरिक होना चाहिए। टेक्निकल/प्रोफेशनल कोर्सो में प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों को बैंक प्राथमिकता देते हैं।

लोन के लिए जमानत

सभी बैंक प्राय: हर तरह के लोन के लिए जमानत यानी सिक्युरिटी लेते हैं। इसे इस तरह से समझ सकते हैं कि आप यदि घर खरीदने के लिए होम लोन लेते हैं, तो बैंक जमानत के तौर पर घर स्वामित्व के दस्तावेज अपने पास रख लेता है और लोन की राशि चुकता होने के बाद ही उसे लौटाता है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के निर्देशानुसार चार लाख तक के एजुकेशनल लोन के लिए कोई सिक्युरिटी नहीं देती होती है, बस स्टूडेंट और उसके माता-पिता की आर्थिक पृष्ठभूमि और इनकम टैक्स रिकॉर्ड देखकर ही लोन दे दिया जाता है। लेकिन इससे अधिक धनराशि के लिए को-लैटरल सिक्युरिटी डिपॉजिट के माध्यम से एजुकेशन लोन दिया जाता है, जिसकी वास्तविक वैल्यू सामान्यतया लोन की धनराशि से दस-पंद्रह गुना अधिक होती है। इस डिपाजिट के तहत किसी प्रकार की अचल संपत्ति, नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट या इसी तरह का कोई अन्य डिपाजिट हो सकता है।

लोन लौटाने की अवधि

एजुकेशन लोन लौटाने की अवधि पांच से लेकर सात वर्ष तक होती है। एक बार लोन री-पेमॅन्ट की शुरुआत हो जाने पर इसे सात साल के भीतर पूरा चुकाना होता है। वैसे, स्टूडेंट के कोर्स पूरा कर लेने या उसके नौकरी ज्वॉइन कर लेने के छह माह बाद (दोनों में से जो भी पहले हो), लोन की वापसी की शुरुआत करनी होती है। किसी कारण लोन चुकाने में असमर्थ रहने पर बैंक को सिक्युरिटी डिपाजिट जब्त करने या उसकी नीलामी करके अपनी धनराशि निकालने का हक होता है।

एजुकेशन लोन की कुछ खास बातें

ज्यादातर बैंक 15 लाख रुपये तक की एजुकेशन लोन देते हैं।

भारत में पढने के लिए साढे सात लाख और विदेश में पढने के लिए 15 लाख रुपये का लोन मिल सकता है।

एचएसबीसी जैसा बैंक 25 लाख रुपये तक का लोन देता है।

चार लाख रुपये तक का लोन बैंक केवल इनकम टैक्स पेपर तथा अन्य निवेशों की जांच करने के बाद दे देते हैं।

चार लाख रुपये तक के लोन पर कोई ब्याज नहीं देना पडता, जबकि इससे ज्यादा के लोन पर साधारण दर से ब्याज देना होता है।

लोन लेते समय रखें ध्यान

जरूरत भर का ही लोन लें, ताकि उसे चुकाने में दिक्कत न आए। इसलिए अपनी आवश्यकता का विश्लेषण पहले ही कर लें।

उसी कोर्स के लिए लोन लें, जिसे करने के बाद आसानी से नौकरी मिल जाए और लोन चुका सकें।

लोन लेने के लिए एक से अधिक बैंकों को परखें।

ब्याज की दरों और रीपेमॅन्ट विकल्पों के बारे में ध्यान से पढें। छिपी बातों का भी पता लगाएं, ताकि लोन चुकाते समय परेशानी न हो।

20 लाख तक ले सकते हैं लोन

देश या विदेश से उच्च शिक्षा हासिल करने में महंगी फीस अब बाधक नहीं है, क्योंकि इसके लिए प्राय: सभी बैंकों द्वारा एजुकेशनल लोन दिए जाते हैं। लेकिन एजुकेशन लोन प्राप्त करने के लिए कुछ शर्ते पूरी करनी होती हैं। एजुकेशन लोन कौन और कैसे ले सकता है, इस बारे में जोश की ओर से अमित निधि ने बात की आईसीआईसीआई बैंक के पर्सनल लोन हेड (मुंबई) राहुल मलिक से। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश :

एजुकेशन लोन कौन ले सकता है?

एजुकेशन लोन उन स्टूडेंट को ही दिया जाता है, जो आगे की पढाई यानी हायर टेक्निकल और प्रोफेशनल कोर्स भारत या इससे बाहर करना चाहते हैं। खासकर, एजुकेशन लोन विभिन्न करियर ओरिएंटेड कोर्सो-इंजीनियरिंग,मैनेजमेंट, मेडिकल आदि में प्रवेश लेने वाले स्टूडेंट्स को आसानी से मिल जाता है। इसके अलावा, गे्रजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स करने वाले स्टूडेंट्स को भी एजुकेशन लोन दिया जाता है। वैसे, कोर्स फीस केअतिरिक्त कम्प्यूटर, मेडिकल किट आदि के लिए भी लोन दिया जाता है।

एजुकेशन लोन के लिए किन-किन दस्तावेजों की जरूरत होती है?

इसके लिए सबसे पहले जिस बैंक से लोन लेना है, वहां का निर्धारित फॉर्म भरना होता है। फॉर्म के अलावा, फोटोग्राफ, आईडेंटिटी प्रूफ, रेजिडेंस प्रूफ, इनकम प्रूफ, एजुकेशनल क्वालिफिकेशन से संबंधित सर्टिफिकेट्स, सीनियर सेकेंड्री स्कूल की मार्कशीट, एमबीए के लिए पोस्ट ग्रेजुएट या गे्रजुएशन की मार्कशीट, स्कॉलरशिप से संबंधित डॉक्यूमेंट्स (यदि कैंडिडेट के पास है) आदि की जरूरत होती है। इसके अलावा, एडमिशन लेटर और कोर्स ड्यूरेशन आदि से संबंधित प्रूफ की भी जरूरत होती है।

एजुकेशन लोन आसानी से स्वीकृत कराने के लिए किस तरह की सावधानी बरतनी चाहिए?

स्टूडेंट को चाहिए कि वे लोन से संबंधित जो विवरण और दस्तावेज दे रहे हैं, वे पूरी तरह सही हों और बैंक के दिशा-निर्देशों के अनुरूप हों। साथ ही, कोर्स के दौरान कितना खर्च आ सकता है, उसका भी विवरण देना चाहिए।

क्या लोन की स्वीकृति यूनिवर्सिटी और इंस्टीट्यूट के स्टेटस पर भी निर्भर करती है?

लोन की स्वीकृति बैंक के नियमों के तहत ही दी जा रही है। कई बार लोन के दौरान कोर्स और यूनिवर्सिटी को भी ध्यान में रखा जाता है। साथ ही, पेरेंट्स या को-अप्लिकेंट केफाइनैंशियल स्टेटस को भी देखा जाता है। यदि आईसीआईसीआई बैंक की बात करें, तो हम इंस्टीट्यूट या कॉलेज के अलावा, कैंडिडेट्स के पेरेंट्स या को-अप्लिकेंट के फाइनैंशियल स्टेटस को भी मद्देनजर रखते हैं।

एजुकेशन लोन के अंतर्गत अधिकतम और न्यूनतम लोन की सीमा कितनी है?

अलग-अलग बैंकों के अनुसार एजुकेशन लोन न्यूनतम 20 हजार रुपये से लेकर अधिकतम 20 लाख रुपये तक लिया जा सकता है।

क्या एजुकेशन लोन के लिए सिक्योरिटी की भी जरूरत होती है?

चार लाख रुपये तक के एजुकेशन लोन पर किसी सिक्योरिटी की जरूरत नहीं होती है। लेकिन इसके लिए हम पेरेंट्स के फाइनैंशियल स्टेटस का अप्रेजल करते हैं। यदि चार लाख रुपये से अधिक लोन लेते हैं, तो लोन के अनुरूप सिक्योरिटी की जरूरत होती है या किसी थर्ड पार्टी को गारंटी लेनी पडती है।

एजुकेशन लोन के री-पेमॅन्ट की प्रक्रिया क्या है?

कोर्स के दौरान पहले साल उपयोग किए गए लोन का सिम्पल इंटरेस्ट ही अदा करना होता है। लेकिन कोर्स खत्म होने के बाद री-पेमॅन्ट की प्रक्रिया शुरू होने के पांच वर्षो में पूरा पेमॅन्ट करना होता है। आमतौर पर कोर्स पूरा होने या नौकरी मिलने के छह माह बाद से लोन की रकम लौटानी होती है।

RAJVIR YADAV

funn

बंता (संता से)- संता यह चाकू क्यों उबाल रहे हो?

संता (बंता से)- आत्महत्या करने के लिए।

बंता- तो फिर उबालने की क्या जरूरत है?

संता- कहीं इंफेक्शन न हो जाए।

FUNN

रामू (डॉक्टर से)- डॉक्टर साहब! ये फूलों की माला किस के लिए?

डॉक्टर (रामू से)- ये मेरा पहला ऑपरेशन है, सफल हुआ तो मेरे लिए, नहीं तो तुम्हारे लिए।

मेरे जीने के लिए सौ की उमर छोटी है : विष्णु

मुजफ्फरनगर, उत्तरप्रदेश के कस्बे मीरापुर में 12 जून, 1912 को जन्मे विष्णु प्रभाकर इसी 12 जून को (12 जून, 2005) 94वें वर्ष में प्रवेश कर चुके हैं। छोटी आयु में ही वे मुजफ्फरनगर से हिसार (हरियाणा) आ गए थे जो पहले पंजाब में था। जीवट के धनी विष्णु जी को बंधी-बंधायी नौकरी कभी रास नहीं आयी। हाईस्कूल करते हुए उन्हें एक नौकरी से जुडना पडा परन्तु यह सिलसिला देर तक न चला। बाद में भी कहीं भी लंबी अवधि तक वे टिक नहीं सके। गाँधी जी के जीवनादर्शो से प्रेम के कारण उनका रुझान कांग्रेस की तरफ हुआ तथा आजादी के दौर में बजते राजनीतिक बिगुल में उनकी लेखनी का भी अपना एक मिशन बन गया था जो आजादी के लिए प्रतिश्रुत और संघर्षरत थी। अपने लेखन के दौर में वे प्रेमचंद, यशपाल, जैनेन्द्र, अज्ञेय जैसे महारथियों के सहयात्री रहे, किन्तु रचना के क्षेत्र में उनकी अपनी एक अलग पहचान बनी। 1931 में हिन्दी मिलाप में पहली कहानी दीवाली के दिन छपने के साथ ही उनके लेखन का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आज आठ दशकों तक निरंतर सक्रिय है। नाथूराम शर्मा प्रेम के कहने से वे शरतचन्द्र की जीवनी आवारा मसीहा लिखने के लिए प्रेरित हुए जिसके लिए वे शरत को जानने के लगभग सभी सभी स्त्रोतों, जगहों तक गए, बाँग्ला भी सीखी और जब यह जीवनी छपी तो साहित्य में विष्णु जी की धूम मच गयी। कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी, संस्मरण, बाल साहित्य सभी विधाओं में प्रचुर साहित्य लिखने के बावजूद आवारा मसीहा उनकी पहचान का पर्याय बन गयी। बाद में अ‌र्द्धनारीश्वर पर उन्हें बेशक साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला हो, किन्तु आवारा मसीहा ने साहित्य में उनका मुकाम अलग ही रखा। उन पर लिखे नया ज्ञानोदय के अपने संपादकीय में प्रभाकर श्रोत्रिय ने ठीक ही लिखा है कि विष्णु जी साहित्य और पाठक के बीच स्लिप डिस्क के सही हकीम हैं। यही कारण है कि उनका साहित्य पुरस्कारों के कारण नहीं, पाठकों के कारण चर्चित हुआ है।
पिछले दिनों गणतंत्र दिवस पर आमंत्रित होने के बावजूद अपने पुत्र के साथ राष्ट्रपति भवन में प्रवेश न मिल पाने से खिन्न मन घर लौटने पर जब वे यह निर्णय लेने को बाध्य हुए कि उन्हें मिला पद्मभूषण लौटा देना चाहिए तो वे अचानक कुछ दिनों सुर्खियों में रहे। पता चलने पर राष्ट्रपति ने जब उन्हें वाहन भेज कर बुलाया और असावधानीवश हुई त्रुटि के लिए क्षमा मांगी तो विष्णु जी ने अपनी पेशकश वापस ले ली।
प्रस्तुत है प्रख्यात साहित्यकार विष्णु प्रभाकर से डॉ. ओम निश्चल से हुई बातचीत के प्रमुख अंश:-
मैं जब विष्णु प्रभाकर जी के घर महाराणा प्रताप एन्क्लेव पहुंचा, उस समय दोपहर के लगभग बारह बज रहे थे। बाहर धूप थोडी तीखी हो चली थी। मुख्य गेट खोल कर अंदर कमरे में दाखिल हुआ तो वे पालथी मारे लैंप की रोशनी में चिट्ठियों का उत्तर लिख रहे थे। इतनी वय में भी वे अपने पाठकों का ख्याल रखते हैं, यह जानकर मन को संतोष हुआ। अपना परिचय देते हुए उनका कुशल क्षेम जानने की जिज्ञासा की तो उन्होंने कहा, देखिए 93 बरस से ज्यादा का हो गया हूँ। छिहत्तर बरस लिखते हो गए। अब यह सब कठिन होता जा रहा है। काम नहीं होता। अखबार के अक्षर पढने में कम आते हैं। उम्र का असर है यह। फिर भी आपके मन में पाठकों के पत्रों के प्रति उत्साह बचा हुआ है। उत्साह ही नहीं, कोई भी पत्र अनदेखा , अनुत्तरित न चला जाए, इस बात का कितना ख्याल रखते हैं आप? कहने लगे, अब क्या कहूँ। नौजवान पाठक- पाठिकाएं दूर-दराज से पत्र लिखते हैं। कोई चीज पढी-किसी रचना ने उन्हें छुआ, उद्वेलित किया तो वे पत्र लिखने बैठ जाते हैं। उन्हें क्या मालूम कि मुझसे अब उत्तर नहीं दिया जाता। हाँ, कोई उत्तर लिखने वाला होता है तो बोल कर लिखाता भी हूँ, पर इसके लिए कोई नियमित रूप से आता भी नहीं। देखिए, जब तक निभा पाता हूँ, उत्तर देता रहूंगा। पर मैं चाहता हूं कि मेरे पाठक समझें कि अब मैं वृद्ध हो गया हूं-उनके पत्रों का उत्तर लिखने की साम‌र्थ्य मुझमें दिनोंदिन कम होती जा रही है। मैंने कहा भी कि वे चाहें तो कुछ पत्रों के उत्तर बोल दें तो मैं लिख देता हूँ, पर उन्होंने शालीनता से मना कर दिया। ऐसी स्थिति में लेखन के सिरे को नियमित कैसे रख पाते हैं? मैंने जानना चाहा तो उन्होंने कहा, भई, अब मुझे किसी यश की आकांक्षा तो है नहीं, धन की भी मुझे ज्यादा दरकार नहीं है, सब कुछ तो मिल चुका- वही बहुत है। हां, मैं शांति से अपनी आत्मकथा का चौथा खंड पूरा कर सकूं , इतनी मोहलत और एकांत ईश्वर से और चाहता हूं। वैसे तो वह अभी ही उठा ले तो मैं क्या कर सकता हूं।
इस जराजीर्ण स्वास्थ्य के चलते आत्मकथा का चौथा खंड कैसे पूरा करेंगे, पूछने पर वे संजीदा हो उठे। बोले, हफ्ते में तीन-चार दिन लोग भेंट करने-बातचीत करने के लिए आ जाते हैं- बातचीत से मैं थक जाता हूं। लिखने का समय ही नहीं मिल पाता। किसी गुमनाम-सी जगह चला जाऊँ तो शायद इसे पूरा कर सकूं । कहने लगे, अभी कल परसों की ही बात है, टी वी वाले चार-पाँच घंटे लगाकर गए। कोई मानदेय नहीं- समय की बरबादी अलग। टी. वी. वालों को तो अपने कार्यक्रम चलाने हैं, लोगों की सुविधा- असुविधा का ख्याल उन्हें कहां है। अखबारों से भी लोग अक्सर आते रहते हैं-मुझे खुद उनकी स्क्रिप्ट भी सुधारनी पडती है, पर पारिश्रमिक के नाम पर कुछ भी नहीं। एक बार एक टी. वी. चैनल वाले मेरा इंटरव्यू ले गए और बदले में किसी मशहूर होटल के खाने का कूपन दे गए कि वहां जाने पर 50 प्रतिशत की रियायत मिलेगी। अब वहां जब हजार रुपये का बिल आएगा तो पचास फीसदी काट कर भी तो पांच सौ देने पडेंगे। इससे तो मैं दस दिन खा लूंगा। तो यह हाल है!
मोहन सिंह प्लेस का काफी हाउस कभी विष्णु प्रभाकर की मौजूदगी से गुलजार रहा करता था। पिछले लगभग पांच वर्षो से वे वहां नहीं आ-जा पाते। वे जब भी काफी हाउस में दिखते, लेखकों के वृत्त से घिरे होते। खद्दर का कुर्ता और गाँधी टोपी दूर से ही दिख जाती। बतरस के धनी विष्णु जी उस दौर को याद कर भावुक हो उठते हैं। कभी लोहिया भी वहां आते थे, अन्य राजनेता भी।
चूंकि बातचीत का कोई निश्चित क्रम बन नहीं पा रहा था और वे बीच बीच में पत्र भी लिखते जाते थे, मैंने चर्चा के सिरे को बढाते हुए आवारा मसीहा की बात उठायी। कहने लगे, निश्चय ही मुझे साहित्य में यह कृति जिंदा रखेगी। मैंने पूछा, बंगाल में इसका रिस्पांस कैसा रहा, तो बोले कुछ बहुत अच्छा तो नहीं। बांग्ला अनुवाद भी इसका हुआ, पर उसमें बांग्लाभाषियों ने ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखायी। हालांकि वे भीतर ही भीतर इस काम को रिकग्नाइज तो करते ही हैं।
ब्यूरोक्रेसी और सरकारी तंत्र की बात छिडी तो उनके चेहरे पर आक्रोश और क्षोभ की लकीरें खिंच गयीं। उन्हें अपने मकान को छलछद्म से अपने नाम करा लेने वाले किरायेदार को बेदखल कराने के लिए सरकारी अहलकारों तक की गयी दौडधूप और बदले में मिलने वाले अपमान और झिडकियों की याद ताजा हो उठी। बताते हैं, मकान बनाने पर कुछ दिनों के लिए उसे एक किरायेदार को रहने को दिया तो उसने भीतर ही भीतर विष्णु जी की अवस्था, लाचारी का लाभ उठाकर तथा डीडीए वालों से सांठगांठ कर उसे अपने काम करा लिया। सेलडीड और अन्य कागजात पर विष्णु जी के जाली हस्ताक्षर भी हो गए। डीडीए वालों से मिलने पर कोई सुनवाई नहीं हुई। डीडीए के अधिकारी यह मानने को तैयार ही नहीं हुए कि इसमें कोई जालसाजी हुई है, क्योंकि ये लोग पैसे ले चुके थे। यह मकान उन्होंने सस्ती के जमाने में चार-पांच लाख की लागत में बनवाया था। आज इसकी कीमत कई लाख होगी। विष्णु जी और उनके लडके ने मदद के लिए बहुतों से संपर्क किया पर किसी ने ध्यान न दिया। अंतत: पुलिस महकमे का एक इंस्पेक्टर काम आया। साहित्यिक रुचियों का होने के कारण उसने इस काम में दिलचस्पी ली, तब कहीं जाकर मकान खाली हो पाया। विष्णु जी कहते हैं, सभी सरकारी मशीनरी बिकी हुई है-सभी स्तर के कर्मचारियों के पैसे बँधे हैं।
इन दिनों जब से पद्मभूषण लौटाने का प्रसंग चर्चा में आया, उन्हें कुछ व्यक्तियों के अभिनिंदक पत्र भी मिले। पद्मभूषण उन्हें भाजपा शासनकाल में मिला, जिस कारण ये लोग आरोप लगाते हैं कि उन्होंने यह पुरस्कार भाजपा से मैनेज किया है, जबकि विष्णु जी कहते हैं, कि उनका नाम तो साहित्य अकादमी से प्रस्तावित हुआ था और सांप्रदायिकता के मुद्दे पर वे अपने को भाजपा का विरोधी मानते हैं। यह और बात है कि भाजपा के भी शीर्ष नेताओं में अटल जी से उनसे निकट के संबंध हैं। विष्णुकांत जी से भी थे। वे गुस्से से कहते हैं, वैसे भी इस तमगे की बाजार में कोई कीमत तो है नहीं। मुझे क्या मिलने वाला है इससे? जो मिलना था, बहुत मिल चुका। अब मुझे किसी भी चीज की स्पृहा नहीं है। ऐसे अलंकरण से कहीं ज्यादा संतोषदायी बात मेरे लिए यह है कि मेरा लेखन चलता रहे। मैंने कहा कि कुछ लोग तो अपने नाम के पीछे पद्मश्री- पद्मविभूषण लगाने में गौरव समझते हैं तो उन्होंने कहा, वे लोग शायद नहीं जानते कि ऐसा करना जुर्म है। यह तो महज अलंकरण है, नाम और उपाधि का हिस्सा नहीं है। इस बीच उनकी पुत्रवधू चाय रख गयी थीं। उन्होंने मेरे साथ चाय पी और बिस्कुट भी लिया और पुन: पत्रों को पढने और उनके उत्तर देने में दत्तचित्त हो उठे थे। मैंने कैमरे से उनकी फोटो लेने की इजाजत चाही तो उन्होंने सिर उठाया। दो-तीन स्नैप के बाद वे फिर ध्यानमग्न हो गए। दोपहर के डेढ बज चुके थे। सुई दो की ओर अग्रसर थी। उनके स्नान व भोजन का समय हो चुका था। मैंने विदा ली।