Thursday, March 20, 2008

पॉकेट मनी है न!


राहुल को उसके पापा हर हफ्ते पॉकेट मनी देते हैं। वह उन पैसों से अपनी पर्सनल जरूरतें पूरी करता है। कभी-कभी हफ्ते भर की पॉकेट मनी वह दो दिन में ही खत्म कर देता और फिर पापा से और अधिक पैसे की डिमांड करता। उसकी बढती जरूरतों को देखकर उसके पापा जब उससे पूछते कि तुम इन पैसों का करते क्या हो, तो वह जवाब देता कि इतने से तो रुपये बस ऐसे ही खत्म हो जाते हैं।

संभवत: राहुल की ही तरह आप लोग भी अपनी पॉकेट मनी के प्रति बडे कॉन्शियस रहते हो, और फिक्स्ड डेट पर तुरंत पापा से पॉकेट मनी लेने से चूकते नहीं हो।

लेकिन दोस्तो! पॉकेट मनी सिर्फ इसलिए नहीं होती कि आप लोग उसे धडल्ले से खर्च करें। दरअसल, पॉकेट मनी का जिक्र आते ही याद आता है पिग्गीबैंक। याद आ गई न गुल्लक की! जी हां, वही गुल्लक, जिसमें आप बचपन से रुपये जमा करते आए हैं।

आपमें से ज्यादातर लोग पॉकेट मनी मिलने से पहले ही अपने खर्चे की लिस्ट बना लेते हैं। कुछ हद तक आपका खर्च करना ठीक भी है, क्योंकि आपकी भी कुछ पर्सनल जरूरतें होती हैं। बडी फरमाइशें तो पैरेंट्स पूरी कर देते हैं, लेकिन बाकी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए पॉकेट मनी तो चाहिए ही न!

पॉकेट मनी के बारे में 13 साल का तन्मय कहता है कि उसे उसके पैरेंट्स हर सप्ताह 100 रुपये देते हैं, इस पॉकेट मनी को या तो वह जंक फूड खाने में खर्च करता है या फिर कम्प्यूटर गेम्स की नई-नई सीडी लाने में। वहीं उसकी छोटी बहन सान्या, जो पांचवीं क्लास की स्टूडेंट है, को 50 रुपये प्रति सप्ताह पॉकेट मनी मिलती है, जिसे वह पेन, पेंसिल खरीदने में ही खर्च करना पसंद करती है।

पॉकेट मनी सेविंग के बारे में जब हमने 12 वर्षीय शशांक से बात की, तो उसने हमें एक वाक्या सुनाया। उसने बताया कि उसे हर सप्ताह 50-60 रुपये पॉकेट मनी के रूप में मिलते हैं। उन पैसों से या तो पह कॉमिक्स खरीदता या फिर स्पाइडरमैन, पोकमैन इत्यादि के स्टीकर्स। एक बार खेल के दौरान उससे उसके फ्रेंड का रैकेट टूट गया। वह उसे रैकेट के पैसे देना तो चाहता था, पर उसके पास कुछ भी सेविंग नहीं थी, पैरेंट्स से पैसे लेता, तो शायद डांट भी पडती। इसलिए उसने कुछ महीनों तक अपनी पॉकेट मनी का कुछ पार्ट सेव किया और फिर एक दिन अपने पिग्गीबैंक में से पैसे निकालकर अपने फ्रेंड को एक नया रैकेट गिफ्ट किया। अगर पॉकेट मनी को मंथली रूप में देखें, तो अमूमन यह करीब 200 से 400 रुपये होती है, मतलब सात रुपये से तेरह रुपये प्रति दिन आपको मिलते हैं। इसलिए अपने रोजाना के खर्चे को इसी लिमिट में सीमित करने की कोशिश करें। जाहिर है इन्हीं की तरह आपके और आपके फ्रेंड्स भी अपनी पॉकेट मनी अपनी च्वॉइस और इंट्रेस्ट के अनुसार अलग-अलग चीजों पर खर्च करते होंगे। मेट्रो सिटीज में तो कुछ टीनएजर्स की पॉकेट मनी महीने में हजार-दो हजार रुपये तक होती है।

हर किसी के अलग-अलग खर्चे होते हैं, और इसीलिए सभी की पॉकेट मनी में वैरिएशंस होते हैं, लेकिन एक ऐसी चीज भी है, जो आप सभी की पॉकेटमनी में कॉमन होनी चाहिए, और वह है सेविंग।

अब शायद आपको लगे कि हमें सेविंग करने की क्या जरूरत है, क्योंकि जब भी हमें रुपयों की जरूरत होगी, तो हम पैरेंट्स से मांग ही लेंगे। लेकिन दोस्तो, याद रखिए कि पॉकेट मनी में से की गई सेविंग न केवल जरूरत के वक्त आपके काम आएगी, बल्कि कभी-कभी आप लोग इस सेविंग्स से दूसरों की मदद भी कर सकेंगे। शायद आप लोगों को पता नहीं होगा कि पिछले वर्ष उडीसा में आप जैसे कुछ स्टूडेंट्स ने चार साल तक अपनी पॉकेट मनी का कुछ हिस्सा जोडकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के एक स्टैच्यू का निर्माण कराया। अपनी इन छोटी-छोटी सेविंग के जरिए आप किसी अवसर पर अपने पैरेंट्स के लिए गिफ्ट भी खरीद सकते हो।

अब आप लोगों को लग रहा होगा कि पॉकेट मनी सेविंग कितनी जरूरी है और इससे आप क्या-क्या कर सकते हैं और अगर लग रहा है कि सेविंग जरूरी है, तो अभी से डेवलॅप कीजिए पॉकेट मनी को सेव करनी की हैबिट, ताकि जब कभी आपको रुपयों की अचानक जरूरत पडे, तो आप निश्चिंत होकर कह सकें कि डॅन्ट वरी, पिग्गीबैंक है

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