मुजफ्फरनगर, उत्तरप्रदेश के कस्बे मीरापुर में 12 जून, 1912 को जन्मे विष्णु प्रभाकर इसी 12 जून को (12 जून, 2005) 94वें वर्ष में प्रवेश कर चुके हैं। छोटी आयु में ही वे मुजफ्फरनगर से हिसार (हरियाणा) आ गए थे जो पहले पंजाब में था। जीवट के धनी विष्णु जी को बंधी-बंधायी नौकरी कभी रास नहीं आयी। हाईस्कूल करते हुए उन्हें एक नौकरी से जुडना पडा परन्तु यह सिलसिला देर तक न चला। बाद में भी कहीं भी लंबी अवधि तक वे टिक नहीं सके। गाँधी जी के जीवनादर्शो से प्रेम के कारण उनका रुझान कांग्रेस की तरफ हुआ तथा आजादी के दौर में बजते राजनीतिक बिगुल में उनकी लेखनी का भी अपना एक मिशन बन गया था जो आजादी के लिए प्रतिश्रुत और संघर्षरत थी। अपने लेखन के दौर में वे प्रेमचंद, यशपाल, जैनेन्द्र, अज्ञेय जैसे महारथियों के सहयात्री रहे, किन्तु रचना के क्षेत्र में उनकी अपनी एक अलग पहचान बनी। 1931 में हिन्दी मिलाप में पहली कहानी दीवाली के दिन छपने के साथ ही उनके लेखन का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आज आठ दशकों तक निरंतर सक्रिय है। नाथूराम शर्मा प्रेम के कहने से वे शरतचन्द्र की जीवनी आवारा मसीहा लिखने के लिए प्रेरित हुए जिसके लिए वे शरत को जानने के लगभग सभी सभी स्त्रोतों, जगहों तक गए, बाँग्ला भी सीखी और जब यह जीवनी छपी तो साहित्य में विष्णु जी की धूम मच गयी। कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी, संस्मरण, बाल साहित्य सभी विधाओं में प्रचुर साहित्य लिखने के बावजूद आवारा मसीहा उनकी पहचान का पर्याय बन गयी। बाद में अर्द्धनारीश्वर पर उन्हें बेशक साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला हो, किन्तु आवारा मसीहा ने साहित्य में उनका मुकाम अलग ही रखा। उन पर लिखे नया ज्ञानोदय के अपने संपादकीय में प्रभाकर श्रोत्रिय ने ठीक ही लिखा है कि विष्णु जी साहित्य और पाठक के बीच स्लिप डिस्क के सही हकीम हैं। यही कारण है कि उनका साहित्य पुरस्कारों के कारण नहीं, पाठकों के कारण चर्चित हुआ है।
पिछले दिनों गणतंत्र दिवस पर आमंत्रित होने के बावजूद अपने पुत्र के साथ राष्ट्रपति भवन में प्रवेश न मिल पाने से खिन्न मन घर लौटने पर जब वे यह निर्णय लेने को बाध्य हुए कि उन्हें मिला पद्मभूषण लौटा देना चाहिए तो वे अचानक कुछ दिनों सुर्खियों में रहे। पता चलने पर राष्ट्रपति ने जब उन्हें वाहन भेज कर बुलाया और असावधानीवश हुई त्रुटि के लिए क्षमा मांगी तो विष्णु जी ने अपनी पेशकश वापस ले ली।
प्रस्तुत है प्रख्यात साहित्यकार विष्णु प्रभाकर से डॉ. ओम निश्चल से हुई बातचीत के प्रमुख अंश:-
मैं जब विष्णु प्रभाकर जी के घर महाराणा प्रताप एन्क्लेव पहुंचा, उस समय दोपहर के लगभग बारह बज रहे थे। बाहर धूप थोडी तीखी हो चली थी। मुख्य गेट खोल कर अंदर कमरे में दाखिल हुआ तो वे पालथी मारे लैंप की रोशनी में चिट्ठियों का उत्तर लिख रहे थे। इतनी वय में भी वे अपने पाठकों का ख्याल रखते हैं, यह जानकर मन को संतोष हुआ। अपना परिचय देते हुए उनका कुशल क्षेम जानने की जिज्ञासा की तो उन्होंने कहा, देखिए 93 बरस से ज्यादा का हो गया हूँ। छिहत्तर बरस लिखते हो गए। अब यह सब कठिन होता जा रहा है। काम नहीं होता। अखबार के अक्षर पढने में कम आते हैं। उम्र का असर है यह। फिर भी आपके मन में पाठकों के पत्रों के प्रति उत्साह बचा हुआ है। उत्साह ही नहीं, कोई भी पत्र अनदेखा , अनुत्तरित न चला जाए, इस बात का कितना ख्याल रखते हैं आप? कहने लगे, अब क्या कहूँ। नौजवान पाठक- पाठिकाएं दूर-दराज से पत्र लिखते हैं। कोई चीज पढी-किसी रचना ने उन्हें छुआ, उद्वेलित किया तो वे पत्र लिखने बैठ जाते हैं। उन्हें क्या मालूम कि मुझसे अब उत्तर नहीं दिया जाता। हाँ, कोई उत्तर लिखने वाला होता है तो बोल कर लिखाता भी हूँ, पर इसके लिए कोई नियमित रूप से आता भी नहीं। देखिए, जब तक निभा पाता हूँ, उत्तर देता रहूंगा। पर मैं चाहता हूं कि मेरे पाठक समझें कि अब मैं वृद्ध हो गया हूं-उनके पत्रों का उत्तर लिखने की सामर्थ्य मुझमें दिनोंदिन कम होती जा रही है। मैंने कहा भी कि वे चाहें तो कुछ पत्रों के उत्तर बोल दें तो मैं लिख देता हूँ, पर उन्होंने शालीनता से मना कर दिया। ऐसी स्थिति में लेखन के सिरे को नियमित कैसे रख पाते हैं? मैंने जानना चाहा तो उन्होंने कहा, भई, अब मुझे किसी यश की आकांक्षा तो है नहीं, धन की भी मुझे ज्यादा दरकार नहीं है, सब कुछ तो मिल चुका- वही बहुत है। हां, मैं शांति से अपनी आत्मकथा का चौथा खंड पूरा कर सकूं , इतनी मोहलत और एकांत ईश्वर से और चाहता हूं। वैसे तो वह अभी ही उठा ले तो मैं क्या कर सकता हूं।
इस जराजीर्ण स्वास्थ्य के चलते आत्मकथा का चौथा खंड कैसे पूरा करेंगे, पूछने पर वे संजीदा हो उठे। बोले, हफ्ते में तीन-चार दिन लोग भेंट करने-बातचीत करने के लिए आ जाते हैं- बातचीत से मैं थक जाता हूं। लिखने का समय ही नहीं मिल पाता। किसी गुमनाम-सी जगह चला जाऊँ तो शायद इसे पूरा कर सकूं । कहने लगे, अभी कल परसों की ही बात है, टी वी वाले चार-पाँच घंटे लगाकर गए। कोई मानदेय नहीं- समय की बरबादी अलग। टी. वी. वालों को तो अपने कार्यक्रम चलाने हैं, लोगों की सुविधा- असुविधा का ख्याल उन्हें कहां है। अखबारों से भी लोग अक्सर आते रहते हैं-मुझे खुद उनकी स्क्रिप्ट भी सुधारनी पडती है, पर पारिश्रमिक के नाम पर कुछ भी नहीं। एक बार एक टी. वी. चैनल वाले मेरा इंटरव्यू ले गए और बदले में किसी मशहूर होटल के खाने का कूपन दे गए कि वहां जाने पर 50 प्रतिशत की रियायत मिलेगी। अब वहां जब हजार रुपये का बिल आएगा तो पचास फीसदी काट कर भी तो पांच सौ देने पडेंगे। इससे तो मैं दस दिन खा लूंगा। तो यह हाल है!
मोहन सिंह प्लेस का काफी हाउस कभी विष्णु प्रभाकर की मौजूदगी से गुलजार रहा करता था। पिछले लगभग पांच वर्षो से वे वहां नहीं आ-जा पाते। वे जब भी काफी हाउस में दिखते, लेखकों के वृत्त से घिरे होते। खद्दर का कुर्ता और गाँधी टोपी दूर से ही दिख जाती। बतरस के धनी विष्णु जी उस दौर को याद कर भावुक हो उठते हैं। कभी लोहिया भी वहां आते थे, अन्य राजनेता भी।
चूंकि बातचीत का कोई निश्चित क्रम बन नहीं पा रहा था और वे बीच बीच में पत्र भी लिखते जाते थे, मैंने चर्चा के सिरे को बढाते हुए आवारा मसीहा की बात उठायी। कहने लगे, निश्चय ही मुझे साहित्य में यह कृति जिंदा रखेगी। मैंने पूछा, बंगाल में इसका रिस्पांस कैसा रहा, तो बोले कुछ बहुत अच्छा तो नहीं। बांग्ला अनुवाद भी इसका हुआ, पर उसमें बांग्लाभाषियों ने ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखायी। हालांकि वे भीतर ही भीतर इस काम को रिकग्नाइज तो करते ही हैं।
ब्यूरोक्रेसी और सरकारी तंत्र की बात छिडी तो उनके चेहरे पर आक्रोश और क्षोभ की लकीरें खिंच गयीं। उन्हें अपने मकान को छलछद्म से अपने नाम करा लेने वाले किरायेदार को बेदखल कराने के लिए सरकारी अहलकारों तक की गयी दौडधूप और बदले में मिलने वाले अपमान और झिडकियों की याद ताजा हो उठी। बताते हैं, मकान बनाने पर कुछ दिनों के लिए उसे एक किरायेदार को रहने को दिया तो उसने भीतर ही भीतर विष्णु जी की अवस्था, लाचारी का लाभ उठाकर तथा डीडीए वालों से सांठगांठ कर उसे अपने काम करा लिया। सेलडीड और अन्य कागजात पर विष्णु जी के जाली हस्ताक्षर भी हो गए। डीडीए वालों से मिलने पर कोई सुनवाई नहीं हुई। डीडीए के अधिकारी यह मानने को तैयार ही नहीं हुए कि इसमें कोई जालसाजी हुई है, क्योंकि ये लोग पैसे ले चुके थे। यह मकान उन्होंने सस्ती के जमाने में चार-पांच लाख की लागत में बनवाया था। आज इसकी कीमत कई लाख होगी। विष्णु जी और उनके लडके ने मदद के लिए बहुतों से संपर्क किया पर किसी ने ध्यान न दिया। अंतत: पुलिस महकमे का एक इंस्पेक्टर काम आया। साहित्यिक रुचियों का होने के कारण उसने इस काम में दिलचस्पी ली, तब कहीं जाकर मकान खाली हो पाया। विष्णु जी कहते हैं, सभी सरकारी मशीनरी बिकी हुई है-सभी स्तर के कर्मचारियों के पैसे बँधे हैं।
इन दिनों जब से पद्मभूषण लौटाने का प्रसंग चर्चा में आया, उन्हें कुछ व्यक्तियों के अभिनिंदक पत्र भी मिले। पद्मभूषण उन्हें भाजपा शासनकाल में मिला, जिस कारण ये लोग आरोप लगाते हैं कि उन्होंने यह पुरस्कार भाजपा से मैनेज किया है, जबकि विष्णु जी कहते हैं, कि उनका नाम तो साहित्य अकादमी से प्रस्तावित हुआ था और सांप्रदायिकता के मुद्दे पर वे अपने को भाजपा का विरोधी मानते हैं। यह और बात है कि भाजपा के भी शीर्ष नेताओं में अटल जी से उनसे निकट के संबंध हैं। विष्णुकांत जी से भी थे। वे गुस्से से कहते हैं, वैसे भी इस तमगे की बाजार में कोई कीमत तो है नहीं। मुझे क्या मिलने वाला है इससे? जो मिलना था, बहुत मिल चुका। अब मुझे किसी भी चीज की स्पृहा नहीं है। ऐसे अलंकरण से कहीं ज्यादा संतोषदायी बात मेरे लिए यह है कि मेरा लेखन चलता रहे। मैंने कहा कि कुछ लोग तो अपने नाम के पीछे पद्मश्री- पद्मविभूषण लगाने में गौरव समझते हैं तो उन्होंने कहा, वे लोग शायद नहीं जानते कि ऐसा करना जुर्म है। यह तो महज अलंकरण है, नाम और उपाधि का हिस्सा नहीं है। इस बीच उनकी पुत्रवधू चाय रख गयी थीं। उन्होंने मेरे साथ चाय पी और बिस्कुट भी लिया और पुन: पत्रों को पढने और उनके उत्तर देने में दत्तचित्त हो उठे थे। मैंने कैमरे से उनकी फोटो लेने की इजाजत चाही तो उन्होंने सिर उठाया। दो-तीन स्नैप के बाद वे फिर ध्यानमग्न हो गए। दोपहर के डेढ बज चुके थे। सुई दो की ओर अग्रसर थी। उनके स्नान व भोजन का समय हो चुका था। मैंने विदा ली।
Tuesday, March 18, 2008
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